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Published on : Nov 19, 2021, 18:01 PM
By : Bureau

अन्नदाताओं के सामने पहले भी झुकी हैं मोदी सरकार, 2015 में भी वापस लेना पड़ा था कानून

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज 19 नवंबर को राष्ट्र के नाम संबोधन में सरकार के द्वारा लाये गए तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान किया।  इस दौरान उन्होंने कहा कि शीतकालीन सत्र के दौरान कानून को वापस लेने की सभी क़ानूनी प्रक्रिया को पूरी कर ली जाएगी। 

दरअसल, नए कृषि कानून को लेकर पिछले एक साल से किसान आंदोलन कर रहे हैं और आंदोलन के दवाब में ही पीएम मोदी ने यह फैसला लिया हैं।  हालांकि यह पहला मौका नहीं हैं जब केंद्र सरकार अन्नदाताओं के सामने झुकी हो और खुद के द्वारा बनाये गए कानून को वापस लिया हो।  ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी हैं कि इससे पहले आखिरकार कब सरकार को किसानों के आगे घुटने टेकने पड़े थे और कौन सा कानून को वापस लिया गया था।  

भूमि अधिग्रहण कानून को भी सरकार ने लिया था वापस 

नरेंद्र मोदी 2014 में पहली बार प्रधानमंत्री बने और उनके ही द्वारा भूमि अधिग्रहण कानून को लेकर एक न्य अध्यादेश लाया गया, जिसका जम कर विरोध हुआ। नए भूमि अधिग्रहण कानून को लेकर सरकार का कहना था कि भूमि अधिग्रहण विधेयक से लोगों को उचित मुआवजा मिलेगा और अधिग्रहण की प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी लेकिन देश के नागरिकों के साथ - साथ कई राजनीतिक दलों को भी केंद्र सरकार की यह बात रास नहीं आयी थीं।  

दरअसल, साल 2013 तक देश में जमीनों का अधिग्रहण ‘भूमि अधिकरण अधिनियम, 1894’ के तहत होता था। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में इस 110 साल पुराने कानून को बदला और इसकी जगह ‘भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013’ लेकर आई।  हालांकि भाजपा की सरकार ने अध्यादेश लाकर इस कानून में बड़ा बदलाव कर दिया था।  

भूमि अधिग्रहण के लिए 70 प्रतिशत किसानों की अनुमति जरुरी 

मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में इस 110 साल पुराने कानून को बदला और इसकी जगह ‘भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013’ लेकर आई। इस कानून में कहा गया था कि कोई भी जमीन सिर्फ तभी अधिग्रहीत की जा सकती है, जब कम-से-कम 70 प्रतिशत जमीन मालिक इसके लिए अनुमति दें।  और इस नियम को देश के किसान भाइयों से लिए बहुत ही हितकारी माना जाता था लेकिन मोदी सरकार ने इस नियम को निरस्त कर दिया जिसके बाद ही पूरे देश में आंदोलन की बिगुल बज गयी।  

सहयोगी दलों ने भी कर लिया था किनारा 

भाजपा के सहयोगी दलों ने भी भूमि अधिग्रहण बिल को लेकर अपनी आँखे दिखानी शुरू कर दी थी।  केंद्र सरकार में सहयोगी दल शिवसेना ने भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था।  शिवसैनिकों को तो स्पष्ट रूप से यह कहा गया था कि सभी लोगों के बीच जाए और सरकार द्वारा लाये गए भूमि अधिग्रहण कानून के दुष्प्रभावों का व्याख्यान करे वहीं  एक और अन्य सहयोगी दल लोजपा ने भी खुले तौर पर अपनी नाराजगी जाहिर की थी।  जनता के बीच यह संदेश बेहद मजबूती से जा चुका था कि भूमि अधिग्रहण में जो संशोधन सरकार करना चाहती है, वे पूरी तरह से किसान-विरोधी और कॉरपोरेट के हित साधने वाले हैं।  

गौरतलब हो कि चौतरफा विरोध को देखते हुए 31 अगस्त, 2015 को पीएम मोदी ने अपने कार्यक्रम ‘मन की बात’ में संशोधन विधेयक को वापस लेने का ऐलान कर दिया था क्योंकि सरकार पर इस कानून के आने से कई गंभीर आरोप लग रहे थे। कुछ नेताओं का कहना था कि नए भूमि अधिग्रहण कानून की आड़ में सरकार अपने दोषी अधिकारियों को बचाने की कोशिश कर रही हैं क्योंकि मोदी सरकार के संशोधन विधेयक में कहा गया कि किसी सरकारी अधिकारी पर सरकार की अनुमति के बिना कोई मुकदमा दायर नहीं किया जाएगा। 

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